HISTORICAL PLACES लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
HISTORICAL PLACES लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 4 मई 2016

SHANIWAAR WADA PUNE - जानें शनिवार वाड़ा का इतिहास

                 हर किसी को एक भुतिया और डरावनी कहानी पसंद होती है, और तब और भी अच्छी लगती है जब में कहानी में प्रेम, राजनीति, कूटनीति, हत्या एवं अन्य ऐसी चीजें होती है। ऐसी ही कहानी है शनिवार वाड़ा की, जो की पुणे में स्थित है । अगर आपने हाल में ही रिलीस हुई बाजीराव मस्तानी फिल्म देखि है तो आप इस जगह के बारे में समझ गए होंगे। यह वाड़ा बाजीराव के लिए 1730 में बनवाया गया था। 1828 में यहाँ भीषण आग लग जाने के कारण आधा हिस्सा बुरी तरह से जल चुका है । जो आधा हिस्सा बचा है वो अब सैलानियों के लिए एक टुरिस्ट स्पॉट का आकर्षण है । 

                  यहाँ की दीवारों में आप रामायण और महाभारत के कुछ दृश्य की झलक आप देख सकते है। एक 16 कमल की पंखुड़ियों वाला फव्वारा अभी भी वैसे ही दिखता है जैसे वह उस समय दिखता है जो की उस समय की कला का एक अद्भुत उदाहरण है। शनिवार वाड़ा इतिहास के पन्नों में और मराठाओं से जुड़ा एक अद्भुत और इतिहासिक संरचना है।

                    शनिवार वाड़ा पेशवाओं के लिए मुख्यालय हुआ करता था और उस समय पुणे की संस्कृति को दर्शाता था। शनिवार वाड़ा की संरचना को देखकर कोई बढ़ी ही आसानी से ये जान सकता है की इसे सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसका मुख्य दरवाजा 'दिल्ली दरवाजा' के नाम से जाना जाता है, और दूसरे दरवाज़े गणेश, मस्तानी, जंभाल, खिड़की के नाम से जाने जाते थे। यहा के दरवाजों में आप नुकीले लोहे के कील लगे हुए है, यहाँ  पर एक ऐसा भी रास्ता जहा पेशवा हथियों से अपने दुश्मनों को कुचलते थे। 

                    यह वाड़ा सन 1745 में पूरी तरह से बना जिसकी कुल लागत 16,110 रुपये थी जो की उस समय में एक बहुत ही बड़ी रकम थी। कुछ 30 सालो के लगभग सन् 1760 में लगभगा 1000 लोग उस किले के अंदर रह रहे थे। 70 सालों तक यह किला पेशवाओं के लिए घर की तरह रहा जब तक वे जॉन मैल्कम जो की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के थे, उनसे हार का सामना करना पड़ा। जून 1818 में राजा बाजीराव 2, अपने राजपाठ का त्याग कर अपना राज्य जॉन मलकोल्म को दे दिया और तब वह क्षेत्र बिथूर जो की कानपुर के नसदिक है उनके क्षेत्र में आने लगा और उसके बाद शनिवार वाड़ा अंग्रेजों का घर बन गया जब तक 1828 में वह भीषण आग की चपेट में आया।

                  शनिवार वाड़ा के संस्थाप्क पेशवा बाजीराव 1 थे जिनके पुत्र पेशवा बालाजी बाजीराव थे, जो की नानासाहेब पेशवा के नाम से भी जाने जाते थे। नानासाहेब पेशवा के 3 पुत्र थे विश्वासराव, माधवराव और नारायनराव। इनमे से सबसे बड़े विश्वासराव थे जिन्हें पानीपत की तीसरे युद्ध में अफगान सेना का सामना करना पड़ा और जंग में उनकी मृत्यु हो गई। नानासाहेब माधवराव मराठा राज्य के चौथे पेशवा बने जो की अपनी मृत्यु सन् 1772 तक रहे। उसके बाद नारायनरव जो की नानासाहेब के सबसे छोटे पुत्र थे पाँचवे पेशवा बने, उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 17 साल थी।

                इस जगह के लिए नारायनराव के चाचा रघुनाथराव जो की नानासाहेब के भाई थे बड़े ही लंबे समय से राज्य को अपना बनाने के लिए कोशिश कर रहे थे। जब नानासाहेब की मृत्यु हुई तब रघुनाथराव के लिए एक उम्मीद थी की वे अब राज्य संभाले पर, हुआ यह की नारायनराव को राज्य दे दिया गया। यहा तक की नारायणराव भी अपने चाचा को पसंद नहीं करता था, उसे यह लगता था की रघुनाथराव ही उसके बड़े भाई की मृत्यु का कारण है। यह नारायणराव और रघुनाथराव के बीच तय हुआ था की वे दोनों साथ काम करेंगे, परंतु नारायनराव के बर्ताव और उसके बचपने ने दोनों के बीच बहुत बड़ी दूरिया बना दी। एक बार इन दूरियों के कारण ही नारायणराव ने रघुनाथराव को कालकोठरी में डालने का आदेश दे दिया।

                   रघुनाथराव की पत्नी आनंदीबाई, अपने पति के दण्ड के बारे में सुनकर बहुत ही दुखी हुई और गर्दि लोगों से मदद मांगी, गर्दि उस समय जबाज़ और बहुत ही शक्तिशाली लड़ाकू थे जो की मध्य भारत के भील थे। वे एक शिकारी के कस्बे थे। गणेश चतुर्थी के आखिरी दिन 30 अगस्त 1773 में कुछ गर्दी अपने सरदार के साथ जो की सुमेर सिंह गर्दी था महल के अंदर घूंसे और सबको मारना चालू कर दिया जो उनके सामने आता वे उसे चीर देते। नारायनराव ने जब गर्दियों के आते देख तो घबराते हुए अपने चाचा के पास मदद की पुकार लगाने लगा। गर्दियों ने उसका पीछा करते हुए उसका सर कलाम कर उसके टुकड़े टुकड़े कर दिये। रघुनाथराव – नारायनराव को कभी मारना नहीं चाहता था उसने गर्दियों के लिए पत्र में उसे छुड़ाने और नारायनराव को बंधक बनाने को कहा था परंतु आनंदीबाई ने उसके पत्र में नारायणराव ला धारा को बदलकर  नारायनराव ला मारा कर दिया जिसके कारण गर्दियों ने उसे मार डाला।

                आज भी कहा जाता है की नारायणराव पूरे चाँद की रात को नारायनराव की आवाज़ सुनने को मिलती है जिसमे वह अपने चाचा से उसकी जान की मिन्नते मांगता है।









   


Chittorgarh - A History जाने चित्तोडगढ़ के इतिहास के बारे में

                        
                             चित्तोडगढ़ का इतिहास भारतवर्ष के लिए एक सरगर्मी का अध्याय है। 12वी और 13वी शताब्दी में सुल्तानों द्वारा राज दिल्ली अपनी ताकत आजमाने मे लगा था । सुल्तानों ने लगातार मेवाड़ पर जंग छेड़ी हुई थी। यहा से एक ऐसी रानी उभर के आई जिनका नाम था रानी पदमनी। रानी पदमनी के कारण या कह सकते है उनके बहाने ही अल्लाह-उद-दिन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला किया था। उन दिनों चित्तौड़ के राजा थे राजा रतनसेन, जो की एक बहादुर और नेक राजा थे। इसके अलावा की वे एक पत्नी व्रता पति और एक शासक भी थे, बल्कि उन्हें कला से भी बहुत प्रेम था। उनके राज्य में बहुत से प्रतिभावान लोग थे जिनमें संगीत में नामी थे राघव चेतन, परंतु वे एक जादूगर भी थे ऐसा बहुत ही कम लोग जानते थे। राघव चेतन अपने काले जादू से अपने दुशमनों को आराम से रास्ते से हटा देता था, परंतु एक बार किसी ने उसे रंगे हाथो काले जादू का इस्तेमाल करते हुए पकड़ लिया।

                       राजा रतनसेन ने जब यह बात सुनी तो वे अति क्रुद्ध हुए और राघव चेतन को उसका मुँह कला करके और गधे पर बैठा कर अपने राज्य से निकाल दिया। इस दंड ने उनके लिए एक बहुत बड़ा शत्रु खड़ा कर दिया। तब राघव चेतन ने उस राज्य को छोड़कर अपना रुख दिल्ली की तरफ कर लिया और यह रणनीति बनाने लगा की वह कैसे सुल्तान अल्लाह-उद-दिन खिलजी को चित्तौड़ पर हमले के लिए मनाए।

                       अब वह दिल्ली पहुँच कर एक जंगल को अपना बसेरा बना चुका था। उस समय सुल्तान उसी जंगल में अपने शिकार के लिए जाता था। एक बार राघव चेतन ने सुल्तान को जंगल शिकार पर आते हुए देखा और उसने अपनी बासुरी बड़े ही मधुर ढंग से बजानी चालू कर दी जो की सुल्तान को सुनाई दी और वे आश्चर्य चकित हो गए की इस जंगल में कौन इतनी मधुर धुन बाजा रहा है। तब राजा ने अपने सिपाहियों को उस बांसुरी बजने वाले को खोजने को कहा और जब राघव चेतन उसके सामने लाया गया, तो राजा ने उसे अपने महल आने को कहा। राघव चेतन ने बड़ी ही चालक वाणी में उससे पूछा की राजा क्यो उसके जैसे साधारण संगीतकार को अपने महल बुलाना चाहता है, जब उसके पास और भी बहुत से सुंदर वस्तुए बुलाने को है। अल्लाह-उद-दिन ने तब कहा की तुम ऐसा क्यू कह रहे हो, तो उसने सुल्तान को बहका के रानी पदमनी के बारे में बताया और सुल्तान का हवस जाग उठा और उसने तुरंत ही महल पहुँच कर अपनी सेना से चित्तौड़ पर हमले की तयारी करने को कहा।

                        परंतु जब सुल्तान अपनी सेना के साथ चित्तोड़ पहुंचा तब उसने देखा की चित्तौड़ का किला बड़े ही रक्षात्मक तरीके से बना है। सुल्तान बेकरार होने लगा रानी पदमनी की सुंदरता को देखने के लिए, उसने राजा रतनसेन को एक संदेश भेजा की वह रानी पदमनी को बहन मानता है और उससे मिलना चाहता है, यह सुनकर राजा रतनसेन ने रानी पदमनी को अपने भाई से मिलने को कहा पर रानी पदमनी ने सुल्तान से स्वयं मिलने को माना कर दिया।

                         राजा रतनसेन के फिर कहने पर रानी पदमनी ने सुल्तान को उसे एक आईने के सहारे मिलने को कहा। यह सुनकर सुल्तान रानी से मिलने अपने कुछ जाबाज़ और होशियार सिपाहियों (जो की महल की सुरक्षा का जाएजा ले सके) के साथ महल पर गया। जब सुल्तान ने आईने पर देखा तो सुल्तान और भी बेकरार और हवस में आकर रानी को अपना बनाने के लिए ठानने लगा। वापस जाते समय सुल्तान राजा रतन से मिला, तब चालबाजी और किसी तरह से राजा को बंधक बनाकर अपने शिविर में ले आया और रानी पदमनी को राजा के प्राण के बदले उसके पास आकार आत्मसमर्पण करने को कहने लगा।

                         राजपूतों ने यह तय किया की सुल्तान को वो अच्छा सबक सिखाएँगे और एक संदेश सुल्तान को भेजा की रानी को उसके हवाले अगले दिन सुबह कर दिया जाएगा। अगले दिन सुबह होने से पहले ही लगभग 150 डोलियाँ (जिसमे रानी को लेजया जाता था) महल से सुल्तान के शिविर की ओर बढ़ी, सुल्तान खुश होकर रानी के आने की प्रतीक्षा करने लगा पर और डोलिया ठीक राजा रतनसेन के तम्बू के सामने आकार रुक गई। जैसे ही डोलियों के पर्दे उठे उसमे राजा रतनसेन के सिपाही थे जो की बड़े ही फुर्ती से राजा रतनसेन को वहां से छुड़ा कर और घोड़े भागकर महल की ओर ले आए। यह सुनकर और गुस्से में आकार सुल्तान ने अपने सैनिकों से चित्तौड़ को तबाह करने का ऐलान कर दिया। परंतु कितने ही कोशिशों के बाद भी वे महल के अंदर नहीं घुस सके। तब सुल्तान ने अपने सिपाहियों को महल के चारों ओर घेराबंदी करने को कहा और सिपाही एक तरफ से महल के अंदर घुसने में सफल रहे। उसके बाद राजा रतनसेन ने अपने सिपाहियों को आगे बढ्ने और लड़ने के आदेश दिये, पर रानी पदमनी यह भली भांति जानती थी की सुल्तान के सैनिक राजा के सैनिक से कहीं ज्यादा है और राजा हार जाएगा, चित्तौड़ की औरतों और लड़कियों के पास दूसरा और कोई रास्ता न था या तो वे सुल्तान के सिपाहियों के हाथों अपनी इज्ज़त लुटाते या फिर खुदखुशी कर लेते।

                    तब रानी पदमनी ने जौहर अपना कर खुद खुशी करने का सोचा। एक बहुत ही बड़ी आग लगाई गई थी जिसमे रानी के साथ चित्तौड़ की सारी महिलाएं एक एक करके अग्नि में कूद गई, और उन्हें मारता देख उनके आदमी के पास भी और कुछ न बचा था तो बे भी अपनी आखिर सांस तक सुल्तान के सैनिकों से लड़ते रहे और जब सुल्तान और उसके सैनिक अंदर पहुचें तो उनको सिवाए राख और हड्डियों के कुछ ना मिला। 

                     वहाँ जो औरतें ने उस दिन जौहर अपनाया था वे आज तो जिंदा ना है पर उनकी याद में आज भी गाना गाया जाता है जो की उनकी इस बहादुर हरकत के बारे में और भी गौरव की बात करता है। तो ये थी कहानी चित्तरोद की यदि आपको यह इतिहास का पन्ना अच्छा लगा तो कमेंट करना ना भूले हो सकता है की आपका एक कमेंट शायद हमारे लिए प्रशंसा का पात्र हो।       





शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

AMER FORT - जाने आमेर के इस किले का इतिहास इसे क्यू खास बनाता है।

                                    आमेर का किला एक छोटे से शहर आमेर जो की लगभग 4 हजार किलोमीटर के दाएरे मे है जो की  जयपुर से लगभग 11 किलोंटर की दूरी पर है । पहाड़ पर इस किले की जयपुर के क्षेत्र में एक अलग ही पहचान है और यहा आने वाले सैलानियों  के लिए एक अलग ही आकर्षण है । आमेर शहर मीनास समुदाय के लोगों  द्वारा बनाया गया था जो की बाद में राजा मान सिंह के राज्य में तब्दील हुआ। आमेर किले की बाहरी और अंदरूनी बनावट हिन्दू कला का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है । यहा आने के लिए अनेक द्वार एवं रास्ते है । आमेर का किला पानी के लिए मुख्य रूप से माओता झील पर निर्भर है।

                                      यदि आप यहाँ घूमने जाए तो किले की दीवारों में आपको बढ़िया कारीगरी दिखेगी जो की लाल चुने के पत्थरों से बनाई गई है । कई जगह आपको चुने के पत्थरों के साथ संगमरमर की मीनारें भी देखने को मिलेगी । यह किला 4 मालों में बना है। यहा पर दीवान ए आम एक बड़ा सा कमरा  जो की भवन के बराबर है, आम जनता की नुमाइशों और गुज़ारिशों के लिए बनाया गया था जहा राजा से जनता अपनी फरियादें पूरी करने आते थे। यहा दीवान ए खास जो की कुछ करीबी लोगों के लिए बनवाए गए थे... ऐसे ही शीशा महल, सुख निवास जहा पर ठंडी हवा आने के लिए इसके दोनों तरफ पनि के दो तालाब बनवाए गए थे। आमेर के किले को आमेर के महल से भी जाना जाता है। यह महल राजपूत महाराजाओं और उनके शाही परिवारों के रहने के लिए बनवाया गया था । यदि आप इसके गणेश द्वार जो की मुख्य द्वार है , से अंदर आयें तो आपको सिला देवी का मंदिर दिखेगा, यह मंदिर उन्होने तब बनवाया था जब उन्होने जेस्सोर के राजा को हराया था। जेस्सोर अभी बांग्लादेश में है ।

                                          यह महल जायगढ़ के किले के साथ चील के टीले के ठीक ऊपर है । यह महल और जायगढ़ का किला एक ही परिसर मे आते है । दोनों एक दूसरे से भूमिगत जुड़े हुए है। यह इसलिए बनवाया गया था ताकि खतरे के समय परिवार के लोग आमेर के महल से जाइगढ़ के किले पर रक्षात्मक रूप से जा सके । 

                                        कछवाहा समूह  से पहले आमेर एक छोटा सा शहर था जो की अम्बे माता के लिए बनवाया गया था। अम्बे माता जिनको कछवाहा के लोग गट्टा रानी के नाम से जानते थे। यह महल राजा मान सिंह के द्वारा बनवाया गया था और महल जैसा बनवाया गया था आज भी वैसे ही अपने मजबूत दीवारों पर खड़ा है। यह महल मुख्या  रूप से राजा मान सिंह द्वारा बनवाया गया था जिसे की बाद में उनके वंशज राजा जय सिंह 1 द्वारा विकसित करवाया और विस्तार से महल के क्षेत्रों को बढ़ाया गया । उसके बाद इस महल को बाद के राजाओं ने और अच्छी तरह से बनवाया और उसके बाद कछवाहा समूह के लोगों ने जयपुर की तरफ पलायन करना चालू कर दिया।

                                      आमेर का शहर जो की एक प्राचीन शहर है, आमेर किले की तरफ जाने के लिए आपको आमेर शहर से गुज़र कर ही जाना होगा। इस शहर में 18 बड़े मंदिर, 3 जैन मंदिर और 3 मस्जिद है । आमेर में 100 से ज्यादा हाथी है जिनमे से कुछ कुपोषण के कारण संघर्ष कर रहें है। आमेर डेव्लपमेंट एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी ने आमेर पैलेस के लिए 40 करोड़ भी जुटाएँ है जिसे की यहा के पर्यावरण की रक्षा के लिए खर्च किया जा रहा है। एक बार तो यहा पर एक फिल्म की शूटिंग भी रुकवाई जा चुकी है क्योकि शूटिंग के लिए यहा पर एक 500 साल पुरानी कलाकृति जो की चुने पत्थर से बनी हुई थी उसमे छेद कर दिया गया था जिससे की पूरी कलाकृति नष्ट हो गई । हाइ कोर्ट को इस नुकसान के लिए बीच में आना पड़ा और कोर्ट ने अधिकारियों को कड़ी भाषा में समझाइश देते हुए कहा की आप पैसे की लालच में अन्य अंधे होकर इस तरह से इतिहास को तबाह ना करें। 

                                        कुछ लोगों ने यहाँ पर हाथियों के बचाव के लिए भी संगठन  बनाया है जो की हाथियों को ठीक तरह से रहने में मदद कर रहे है। यहाँ पर एक गांव हाथी  गांव के नाम  से जाना जाता है जहां पर बीमार, बूढ़े  और चोटिल हाथियों को के रख रखाव के लिए PETA आर्गेनाइजेशन काम कर रहा है खैर भारत ऐसे और भी अनेक इतिहास आज ज़िंदा है जिनको जानकार आप आश्चर्य चकित हो सकते है।  मेरा यह मानना है की भारत के लोग अगर पहले भारत के बारे में जाने और पहले भारत घूमे तो शायद यहाँ के पर्यटन को दुनिया में एक अलग ही जगह मिल सकती है। यह हो सकता है की बहुत सी चीज़े मैं  आपको ना बता पाउ, घूमिये इस महल को और महसूस कीजिये इतिहास को जो की भारत का गौरव और भी  बढ़ता है।